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Albela Khatri

आदमी के ख़ून का गिलास मेरे देश में............

इक मुख यदि है

गुलाब जैसा महका तो

सैकड़ों के चेहरे उदास मेरे देश में


एक के शरीर पे

रेमण्ड का सफ़ारी है तो

पांच सौ पे उधड़ा लिबास मेरे देश में


काम सारे हो रहे हैं

कुर्सी की टांगों नीचे

काग़ज़ो में हो रहे विकास मेरे देश में


दूध है जो महंगा तो

पीयो ख़ूब सस्ता है

आदमी के ख़ून का गिलास मेरे देश में

10 comments:

श्यामल सुमन August 23, 2009 at 10:56 AM  

बहुत खूब अलबेला भाई।

हैं अधिक तन चूर थककर खुशबू से तर कुछ बदन
इत्र से बेहतर पसीना सूँघना अच्छा लगा

शिवम् मिश्रा August 23, 2009 at 10:59 AM  

"काम सारे हो रहे हैं

कुर्सी की टांगों नीचे

काग़ज़ो में हो रहे विकास मेरे देश में"


सत्य वचन महाराज ||

शिवम् मिश्रा August 23, 2009 at 11:01 AM  

"मैनपुरी के पत्रकारों के साथ हुयी अभद्रता - कवरेज करने से रोका गया"

जरा इस पर भी नज़र-ऐ-इनायत करे |

Mithilesh dubey August 23, 2009 at 11:05 AM  

दूध है जो महंगा तो
पीयो ख़ूब सस्ता है
आदमी के ख़ून का गिलास मेरे देश में

वाह अलबेला जी सच्चाई को उकेरती एक और शनादार रचना। बधाई

अजय कुमार झा August 23, 2009 at 11:10 AM  

कभी होता था स्वर्ग का,
आज होता है, नर्क का ,
एह्सास मेरे देश में...

घट रहा है, प्रेम, अपनापन,
स्नेह, दया, और,
विश्वास मेरे देश में...

सच कहा अलबेला जी....

अर्चना तिवारी August 23, 2009 at 11:20 AM  

सचमुच विडंबना है मेरे देश में...शनादार रचना

राज भाटिय़ा August 23, 2009 at 1:14 PM  

अलबेला जी आप ने जो लेख मेरे बारे लिखा उस के लिये मै आप का दिल से आभारी हुं,मेरे पास शव्द नही आभार प्रकट करने लिये, बस मै दोनो हाथ जोड कर धन्यवाद कर रहा हुं , स्वीकार कर ले

अल्बेला जी

AlbelaKhatri.com August 23, 2009 at 2:37 PM  

आदरणीय राजजी,
स्मरण के लिए धन्यवाद.......

हम सबने वही किया जो हमारे दिल ने कहा..........

दिल कहता है....आप स्वस्थ रहें..मस्त रहें और

ब्लॉगिंग में व्यस्त रहें...........

__________स्नेह बनाए रखें

दर्पण साह "दर्शन" August 23, 2009 at 3:19 PM  

एक के शरीर पे
रेमण्ड का सफ़ारी है तो
पांच सौ पे उधड़ा लिबास मेरे देश में

wah sir ji kya likha hai.
gehra bhaav hai.

hazaron sakdon ki bheed main ek aur kum hoga
magar maa baap ka apne wahi to ek lauta hai,

mere is desh ke saare hi neta saaf dikhte hain,
suan hai ganga ka paani abhi bhi paap dhota hai.

राजीव तनेजा August 24, 2009 at 12:56 AM  

"काम सारे हो रहे हैं

कुर्सी की टांगों नीचे

काग़ज़ो में हो रहे विकास मेरे देश में"

तीखा व्यंग्य

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