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Albela Khatri

गरीब हूँ काफ़िर नहीं !

हाँ हाँ
मैंने बेचा है
बेचा है लोहू जिगर का
बेचा है नूर नज़र का
लेकिन
ईमान नहीं बेचा
मैं खाक़ हूँ ...पर पाक हूँ
मेहनतकशी की नाक हूँ
तुम सा नहीं जो वतन को
शान्ति-चैन-ओ-अमन को
माँ भारती के बदन को
पीड़ितजनों के रुदन को
कुर्सी की खातिर
गैरों के हाथ बेच डालूँ
सत्ता के तलवे चाटूं
और चाँदी का जूता खाने के लिए
अपना ज़मीर बेच डालूं
अरे भ्रष्टाचारियों !
मैं बेचता हूँ सिर्फ़ पसीना
वो भी अपना !
और अपना ही वक़्त बेचता हूँ
पेट भराई के लिए
लेकिन इन्सानियत नहीं बेचता
किसी भी क़ीमत पर नहीं बेचता
क्योंकि मैं
मज़दूर हूँ .....लीडर नहीं !
गरीब हूँ ...काफ़िर नहीं !

7 comments:

महेन्द्र मिश्र June 10, 2009 at 2:35 PM  

बहुत सुन्दर अल्फाज बधाई.

बसंत आर्य June 10, 2009 at 3:14 PM  

बढिया लिखा भाई आज आपने

वन्दना अवस्थी दुबे June 10, 2009 at 3:29 PM  

अपना ही वक्त बेचता हूं....क्या बात है.

ओम आर्य June 10, 2009 at 4:37 PM  

आपने बहुत वाजिब बात कही है जिसका कोई जबाव नही......बहुत बहुत बधाई

ओम आर्य June 10, 2009 at 4:38 PM  

बहुत ही वाजिब बात कही है आपने .......बहुत बहुत शुक्रिया

RAJNISH PARIHAR June 10, 2009 at 5:07 PM  

बहुत अच्छी रचना......!चाहे कुछ कहो आजकल गरीबों में ही कुछ ईमान बचा है!इसका मतलब ये नहीं है की बाकी लोगों में ईमान नहीं है...है किन्तु उसकी अनेक शर्तें है,कीमत है....

प्रिया June 10, 2009 at 8:08 PM  

Wah Sir! aaj aapki post bahut bha gai man ko.... ek sachchey hindustani ki misaal si pesh ki aapne.....mubarak ho

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