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Hindi Hasya kavi Albela Khatri's blog

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Albela Khatri

ऐसा धन बेकार है................

काम वतन के जो न आये, ऐसा तन बेकार है

दया धर्म का भाव न जिसमे, ऐसा मन बेकार है

पड़ा तिजोरी में सड़ जाए,

किन्तु समाज के काम न आये

मेज पे रख कर आग लगादो ऐसा धन बेकार है


_______________इसे गम्भीरता से न लेना भाई ...........

मुझे तो यों ही ऊँची- ऊँची फैंकने की आदत है ....हा हा हा हा हा हा

8 comments:

ताऊ रामपुरिया June 29, 2009 at 10:56 AM  

हमे कौन सी कम फ़ेंकने की आदत है? पर भाई मेज का नुक्सान क्यों करवाते हो? बाहर सडक पर डाल कर आग लगवाने मे ज्यादा अच्छा रहेगा ना?:)

रामराम.

विनोद कुमार पांडेय June 29, 2009 at 11:02 AM  

koi nahi lega gambhirata se.

aaj sab apne liye hi dhan bator rahe hai
yahi to desh ki vidambana hai

parantu aapne bahut sundar baat kahi

Himanshu Pandey June 29, 2009 at 11:27 AM  

ताऊ जी की बात अमल में लाने लायक है ।
बात बहुत अच्छी-अच्छी कह गये हैं आप । आभार ।

Atmaram Sharma June 29, 2009 at 12:02 PM  

आग लगाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, पहले बाहर तो फेक के देखो, लाइन लग जायेगी. कवि गिरधर बहुत पहले ही - दोनों हाथ उलीचिये यही सयानो काम - की सीख दे गये हैं.

रंजन June 29, 2009 at 12:56 PM  

हा हा.. हमें तो सड़क का पता बता देना जी..

weblooktimes June 29, 2009 at 5:47 PM  

वाकई आपकी बात में दम है।

Murari Pareek June 29, 2009 at 7:06 PM  

आप फेंकते रहिये हम लपेटने के लिए तेयार हैं !!!

प्रिया June 29, 2009 at 8:01 PM  

jiske liye bekaar hain wo hamhe de de... Bekaar jeez ko bhi sambhal kar rakh lete hain ham :-)

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