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Hindi Hasya kavi Albela Khatri's blog

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Albela Khatri

मीर सी क्यूँ है .............

ग़मगुसारों की निगाहें तीर सी क्यूँ है
शायरी में दर्द की तासीर सी क्यूँ है

हसरतें थीं कल बिहारी सी हमारी
आज दिल की आरज़ूएं मीर सी क्यूँ है

उनके आते ही सुकूं था लौट आता

सामने वो हैं तो शब शमशीर सी क्यूँ है

ला पिलादे मयफ़िशां अन्दाज़ ही से
दिख रही मय आज मुझको शीर सी क्यूँ है

हिन्द तो 'अलबेला' कितने साल से आज़ाद है
हम पे लेकिन अब तलक ज़ंजीर सी क्यूँ है



12 comments:

Murari Pareek June 17, 2009 at 1:47 PM  

aapko kya wah wahi de ham to is kabil bhi nahi hai aap to hameshaa better hi ho

आदर्श राठौर June 17, 2009 at 1:50 PM  

जय हो
बहुत बढ़िया

Nirmla Kapila June 17, 2009 at 2:12 PM  

उनके आते ही सुकूं था लौट आता

सामने वो हैं तो शब शमशीर सी क्यूँ है

क्या खूब अन्दाज़ है बेहतरीन गज़ल

ताऊ रामपुरिया June 17, 2009 at 2:15 PM  

बहुत सही फ़रमाया. शुभकामनाएं

रामराम.

परमजीत बाली June 17, 2009 at 2:31 PM  

बहुत उम्दा गज़ल।बधाई।

ओम आर्य June 17, 2009 at 2:37 PM  

aapake shero ke jabaab nahi ..........yahee to nahi pata mere bhai....ye janjir si kyon hai

Sheena June 17, 2009 at 4:33 PM  

उनके आते ही सुकूं था लौट आता
सामने वो हैं तो शब शमशीर सी क्यूँ है


bahut hi khoob kaha hai aapne

राज भाटिय़ा June 17, 2009 at 5:04 PM  

बहुत सुंदर जी आप की यह गजल

cartoonist anurag June 17, 2009 at 5:19 PM  

bahut badia...

M. Verma June 17, 2009 at 7:01 PM  

sunder ghazal
kamal

Priya June 17, 2009 at 9:37 PM  

vaise to overall acchi hain aapki creativity but humko to " हसरतें थीं कल बिहारी सी हमारी

आज दिल की आरज़ूएं मीर सी क्यूँ है" ye lines behad pasad aayi

कुमार आशीष June 17, 2009 at 11:05 PM  

ख़याल उम्‍दा हैं।

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