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Hindi Hasya kavi Albela Khatri's blog

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Albela Khatri

मैं भी वतन का राज़ हूँ ..............

तुम हो अन्जाम-ए-वफ़ा मैं प्यार का आगाज़ हूँ

तुम हो कल की दास्ताँ, मैं आज की आवाज़ हूँ



लाखों बाजू मुझपे हावी थे बजाने के लिए

हाय ! लेकिन क्या करूँ ? गर खुरदरा सा साज़ हूँ



दलालों ! बेच दो मुझको भी तुम बाज़ार में

मैं भी हूँ बशर--वतन मैं भी वतन का राज़ हूँ



खाक़ उसकी ज़िन्दगी पे, लाहनतें उस पर हज़ार

जो मुझे कहता रहा तकदीर का मोहताज़ हूँ



सरफिरे दहशत पसन्दों ने लगाई आग गर

चीर डालूँगा उन्हें , देखो मैं तीरन्दाज हूँ



ज़िन्दगी "अलबेला" तुम ज़िन्दादिली से जीयो तो

मौत भी आकर कहेगी "जीने का अन्दाज़ हूँ "

2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi June 27, 2009 at 8:50 AM  

सुंदर!

ओम आर्य June 27, 2009 at 12:23 PM  

सरफिरे दहशत पसन्दों ने लगाई आग गर

चीर डालूँगा उन्हें , देखो मैं तीरन्दाज हूँ

ye aada aapakee mujhe khub bhayi .................aapake is post par meri jaan nishar hogayi BHAIYA

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