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ताऊ रामपुरियाजी और उनका लट्ठ मेरे सपने में

कल राजधानी एक्सप्रेस में एक कमाल की घटना घटी
____________हालाँकि एक बात मेरी समझ में आज तक नहीं आई कि घटना हमेशा घटती ही क्यों है, बढती क्यों नहीं ? जब कि घटना का होना घटनाक्रम में वृद्धि करता है ....यानी हर नई घटना वास्तव में बढती है घटती नहीं लेकिन विद्वान् लोग मानने को तैयार नहीं कि बढ़ी, वे तो बस घटी ही कहते हैं ........खैर जाने दो ..ये कहानी फ़िर सही.............

तो साहेब घटना ये घटी कि जैसे ही मैं खा -पी कर सोया , ताऊ रामपुरियाजी लट्ठ ले के सपने में गएबोले - उट्ठ ! कविता सुनामैं बोला - जी फोकट में मैं किसी को गाली भी नहीं सुनाता, आप कविता की बात करते हैं ..... ताऊ बोले - कैसे नहीं सुनाएगा, यो लट्ठ देख्या है के ? मैं बोला - ताउजी, मैं लट्ठ देख कर नहीं, रिज़र्व बैंक के प्रमाणपत्र देख कर प्रभावित होता हूँ

ताऊ बोले - अच्छा? कितना पैसा लेता है कविता सुनाने का ?
मैं बोला - ताउजी , नज़दीक कहीं जाना हो तो 15-16 हज़ार और दूर कहीं जाना हो तो 25 से 35 हज़ार
बोले - बस ? ये पैमेन्ट तो बहुत ही घटिया है
मैंने कहा - घटिया तो होना ही है, मैं कविता ही कौनसी बढ़िया सुनाता हूँ ......हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा

16 comments:

ओम आर्य June 22, 2009 at 3:26 PM  

वाह क्या बात कह दी आपने .........अपने उपर हसना मुश्किल काम हो ता है ................

Murari Pareek June 22, 2009 at 3:47 PM  

ताऊ जी तो फिर रस्ते लग लिए होंगे!!!

अविनाश वाचस्पति June 22, 2009 at 4:01 PM  

कविता बढि़या हो या घटिया
सुन ले ताऊ जी रामपुरिया
बढि़या पेमेन्‍ट बतलाने में है खतरा
और खत्री अलबेला है नहीं सिरफिरा
इंकम टैक्‍स वाले आयेंगे देखना
कविता भी सुनेंगे बढि़या और
सारी पेमेन्‍ट समेट ले जाएंगे
बढि़या हो या घटिया
इसलिए मित्र अलबेलिया
घटना चाहे बढ़ना हो
घटती ही है नहीं बढ़ती।

अविनाश वाचस्पति June 22, 2009 at 4:03 PM  

ये परमीशन तो मिशन लागे है
जितना मन को जमेगा
उतना ही दिखलायेंगे
पेमेन्‍ट ज्‍यादा मिले
पर
कम ही बतायेंगे
यह भी तो घटना ही है।

M Verma June 22, 2009 at 4:44 PM  

अलबेला जी घटना है तो घटेगी ही बढ तो नही सकती है क्योकि जब आप घटना = घट + ना कहते है तो घटने को ही कहते है.
रही बात ताऊ की तो एकाध कविता सुना ही देते तो कम से कम दुबारा तो सुनाने को नही कहते.

नीरज गोस्वामी June 22, 2009 at 4:53 PM  

भाई कम से कम सपने तो अच्छे देखा करो...क्या रातें आ गयीं हैं आपकी... सपने में ताऊ आन लाग रहे हैं...च च च च च...:))
नीरज

ताऊ रामपुरिया June 22, 2009 at 5:23 PM  

भाई खत्रीजी आप कविता घटिया सुनाते हैं या बढिया? और पेमेंट कौन सा लेते हैं? यह तो मुझे मालूम है.

आपने देखा होगा कि सपने मे मेरे साथ एक आदमी और भी था ना? तो वो आदमी था ईंकमटेक्स कमिश्नर.

मुझे उसने कहा था कि ताऊ ये अलबेला खत्री की सही सही जानकारी निकालो...दस प्रतिशत तुम्हारा कमीशन पक्का.

वो तो गनीमत है कि आपने बात संभाल ली. आजकल ताऊ सपनों मे आकर सब कुछ पता कर लेता है.:)

रामराम.

Udan Tashtari June 22, 2009 at 5:28 PM  

ताऊ को ऐसे ही जबाब मिलते रहे तो चल चुकी उसकी ताऊगिरि. उसे मना किया था कि अपने से बड़े ताऊ को मत घेरा कर. :)

Udan Tashtari June 22, 2009 at 5:30 PM  

वैसे सपने में ताऊ आने लग गये....?? :)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक June 22, 2009 at 6:02 PM  

अलबेले की अलबेली बात,
बहुत खूब।
हा...हा...हा...।

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa June 22, 2009 at 8:06 PM  

आज तक ताऊ की शिनाख्त नहीं हो पायी है। आप पहचान पाए क्या? या अगला अंधेरे का लाभ फिर उठा गया ?

अजय कुमार झा June 22, 2009 at 8:33 PM  

अलबेला जब सपने में आ ही गए थे ..तो पूछ लेते के अगली पहेली में कौन सी फोटू चेपेंगे....ताऊ बनने का जुगाड़ हो जाता....चलो इससे बहाने आपकी फीस पता लग गयी....हा..हा..हा..

●๋• सैयद | Syed ●๋• June 22, 2009 at 10:04 PM  

लो ताऊ ने तो साथ में इनकम टैक्स ऑफिसर को लाकर आपका राज़ तो खोल दिया.

Anil Pusadkar June 23, 2009 at 8:35 AM  

ताऊ के नहले पे अलबेला का दहला।

Anonymous June 23, 2009 at 11:03 AM  

चमचागिरी करने का तुम्हारा ये स्टाईल बडा लाजवाब है भईया!!!!!!!

Vijay Kumar Sappatti June 24, 2009 at 2:12 PM  

waaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaah

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