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Hindi Hasya kavi Albela Khatri's blog

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Albela Khatri

अपनी कोमल हथेली सजा लीजिये

ज़िन्दगानी नहीं अब क़ज़ा दीजिये

मुझको मेरे किए की सज़ा दीजिये


साथ चलने की तुमको ज़रूरत नहीं

चल तो सकता हूँ रस्ता बता दीजिये


पीस डालो मेरा दिल हिना जान कर

अपनी कोमल हथेली सजा लीजिये


ज़ख्म रिसते हैं मेरे तो रिसते रहें

आप गैरों के ग़म की दवा कीजिये


राह से गर हटाना ही चाहो जो तुम

पाँव से एक ठोकर लगा दीजिये

8 comments:

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif June 24, 2009 at 6:34 PM  

वाह! वाह! बहुत उम्दा!

यहां आपकी टिप्पणी का इंतेज़ार है

Unknown June 24, 2009 at 8:01 PM  

कहर बरपा दिया अलबेला महाराज.........

राज भाटिय़ा June 24, 2009 at 8:41 PM  

बहुत लाजबाव,
लेकिन अगर दो पाकेट हिना के ला दो तो दिल बच जायेगा :)
धन्यवाद

अविनाश वाचस्पति June 24, 2009 at 8:43 PM  

हमें पैर का अपने
अंगूठा नहीं तुड़वाना है

ताऊ रामपुरिया June 24, 2009 at 9:14 PM  

पीस डालो मेरा दिल हिना जान कर
अपनी कोमल हथेली सजा लीजिये


वाह गुरु सलाम है आपको.

रामराम.

स्वप्न मञ्जूषा June 24, 2009 at 9:16 PM  

अलबेला जी,

दिल पीस कर हिना लगाने के हम नहीं कायल
बस दो पाकेट हिना का दाम पहुँचा दीजिये

जबरदस्त...

परमजीत सिहँ बाली June 24, 2009 at 10:07 PM  

बहुत बढिया!!

साथ चलने की तुमको ज़रूरत नहीं

चल तो सकता हूँ रस्ता बता दीजिये

नीरज गोस्वामी June 25, 2009 at 12:19 PM  

बढ़िया ग़ज़ल कही है अलबेला जी...बधाई.
नीरज

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