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Albela Khatri

कवि की कलम का जनम



रात न ढले तो कभी

भोर नहीं होती बन्धु

सांझ न ढले तो कभी तम नहीं होता है




लोहू तो निकाल सकता

तेरे पाँव में से

कांच से मगर घाव कम नहीं होता है




जीने की जो चाह है तो

मौत से भी नेह कर

डरते हैं वो ही जिनमें दम नहीं होता है




सच मानो जब तक

पीर का काग़ज़ न हो

कवि की कलम का जनम नहीं होता है

4 comments:

Asha Joglekar June 1, 2009 at 12:37 AM  

सच मानो जब तक

पीर का काग़ज़ न हो

कवि की कलम का जनम नहीं होता है

अति सुंदर ।

gazalkbahane June 1, 2009 at 10:04 AM  

जीने की जो चाह है तो

मौत से भी नेह कर

डरते हैं वो ही जिनमें दम नहीं होता है ..........


हाँ आज हम इनकार करते हैं तेरी हस्ती को ही
खुद मौत माँगेंगे, जियेंगे अपने दम से जिन्दगी
श्याम सखा ‘श्याम;
बहुत जल्द पूरी गज़ल गज़ल के बहाने पर मिलेगी मेरा एक अन्य ब्लॉग
http//:katha-kavita.blogspot.com पर कविता ,कथा, लघु-कथा,वैचारिक लेख पढें

निर्मला कपिला June 1, 2009 at 12:35 PM  

वह अल्बेला जी आपकी तरह रचना भी अलबेली है
सच मानो जब तक पीर का कागज़ ना हो
कवि की कलम का जन्म नहीं होता
पूरी रचना सुन्दर ह
www.veerbahuti.blogspot.com

दिगम्बर नासवा June 1, 2009 at 3:29 PM  

ज़िन्दगी शृंगार है, दोस्ती है ..प्यार है ...
प्रेम के फूल खिलाऊंगा,गीत ख़ुशी के गाऊंगा

खूबसूरत शेर है ................ जीवन में फूल खिलाना ही तोजीना है...........लाजवाब अलबेला जी

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